कभी ज्ञान विज्ञान से विश्व गुरु बना भारत आज विश्व पिच्छलग्गू बन चुका हैहनुमान की भांति जब निज विस्मृति (lostMemory) से बाहर आयेगा, वैदिक ज्ञान की आभा (glory) पहचानेगा,चमकाएगा तब तक केवल नारे से भ्रमायेगा स्वर्ण युग की उस शक्ति को पहचान देगा ज्ञानविज्ञान दर्पण तिलक (Join us to Build StrongBHARAT निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/ निशुल्क सदस्यता व yugdarpan पर इमेल/चैट करें, संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण मीडिया समूह YDMS 09911111611, 9999777358.



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Saturday, October 11, 2014

लौह स्तंभ

लौह स्तंभ भारतीय हिंदू कला, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, और पुरालेख शास्त्र का एक अनुपम उदाहरण है।
लौह स्तंभ दिल्ली में क़ुतुब मीनार के निकट स्थित एक विशाल स्तम्भ है। यह अपनेआप में प्राचीन भारतीय  धातुकर्म की पराकाष्ठा है। यह कथित रूप से राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (शासन 375 - 413) से निर्माण कराया गया, किंतु कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पूर्व निर्माण किया गया, संभवतः 912 ईपू में। स्तंभ की उँचाई लगभग सात मीटर है और पहले हिंदू व जैन मंदिर का एक भाग था। तेरहवीं सदी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने मंदिर को नष्ट करके क़ुतुब मीनार की स्थापना की। लौह-स्तम्भ में लोहे की मात्रा प्राय: 98% है और अभी तक जंग नहीं लगा है। अर्थात लोहा बनाना उसके अवयव से इस्पात बनाने की विधि यहाँ उपलब्ध थी।  अन्य सभ्यताओं का इतिहास डेढ़ से दो सहस्त्र वर्ष का है किन्तु कई सहस्त्र वर्ष पूर्व हिन्दू जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्टता के अद्वितीय उदाहरणों ने सम्पूर्ण जगत को अचंभित किया है। 
लगभग 16000 से अधिक वर्षों से यह खुले आकाश के नीचे सदियों से हर मौसम में अविचल खड़ा है। इतने वर्षों में आज तक उसमें जंग नहीं लगी, यह बात विश्व के लिए आश्चर्य का विषय है। जहां तक इस स्तंभ के इतिहास का प्रश्न है, यह चौथी सदी में बना था। इस स्तम्भ पर संस्कृत में जो उत्कीर्ण किया 'उकेरा' हुआ है, उसके अनुसार इसे ध्वज स्तंभ के रूप में खड़ा किया गया था। चन्द्रराज द्वारा मथुरा में विष्णु पहाड़ी पर निर्मित भगवान विष्णु के मंदिर के सामने इसे ध्वज स्तंभ के रूप में खड़ा किया गया था। इस पर गरुड़ स्थापित करने हेतु इसे बनाया गया होगा, अत: इसे गरुड़ स्तंभ भी कहते हैं। 1050 में यह स्तंभ दिल्ली के संस्थापक, अनंगपाल द्वारा लाया गया। विकिपीडिया मुक्त ज्ञानकोश से साभार http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B2%E0%A5%8C%E0%A4%B9_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%AD
इस स्तंभ की ऊंचाई 735.5 से.मी. है। इसमें से 50 सेमी. नीचे है। 45 से.मी. चारों ओर पत्थर का आधार मंच है। इस स्तंभ का घेरा 41.6 से.मी. नीचे है तथा 30.4 से.मी. ऊपर है। इसके ऊपर गरुड़ की मूर्ति, पहले कभी होगी। स्तंभ का कुल भार 6096 कि.ग्रा. है। 1961 में इसके रासायनिक परीक्षण से पता लगा कि यह स्तंभ आश्चर्यजनक रूप से शुद्ध इस्पात का बना है तथा आज के इस्पात की तुलना में इसमें कार्बन की मात्रा अतिन्यून है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुख्य रसायन शास्त्री डॉ॰ बी.बी. लाल इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इस स्तंभ का निर्माण गर्म लोहे के 20-30 किलो को टुकड़ों को जोड़ने से हुआ है। माना जाता है कि 120 शिल्पकारों ने      दिनों के परिश्रम के बाद इस स्तम्भ का निर्माण किया। आज से सोलह सौ वर्ष पूर्व गर्म लोहे के टुकड़ों को जोड़ने की उक्त तकनीक भी आश्चर्य का विषय है, क्योंकि पूरे लौह स्तम्भ में एक भी जोड़ कहीं भी दिखाई नहीं देता। सोलह शताब्दियों से खुले में रहने के बाद भी उसके वैसे के वैसे बने रहने (जंग न लगने) की स्थिति ने विशेषज्ञों को चकित किया है। इसमें फास्फोरस की अधिक मात्रा व सल्फर तथा मैंगनीज कम मात्रा में है। कठोर परत 'स्लग' की अधिक मात्रा अकेले तथा सामूहिक रूप से जंग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा देते हैं। इसके अतिरिक्त 50 से 600 माइक्रोन मोटी (एक माइक्रोन अर्थात 1 मि.मी. का एक सहस्त्रांश) आक्साइड की परत भी स्तंभ को जंग से बचाती है। 
कभी ज्ञान विज्ञान से विश्वगुरु भारत की, स्वर्ण युग की उस शक्ति को
पहचान देगा; ज्ञान -विज्ञान दर्पण | आओ, मिलकर इसे बनायें; - तिलक
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